अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का अभिसमय संख्या 193 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ 

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन ने कन्वेंशन संख्या–193, “प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था में गरिमापूर्ण कार्य” को अपनाया।
    • इसके पक्ष में 406 मत पड़े (जिनमें चीन, ब्राज़ील, जर्मनी, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका तथा जापान जैसे देश शामिल थे), 8 मत विरोध में पड़े तथा भारत सहित 36 सदस्यों ने मतदान से विरत रहने (Abstain) का निर्णय लिया।
नोट: अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन त्रिपक्षीय संरचना पर कार्य करता है। प्रत्येक सदस्य देश एक नहीं, बल्कि चार प्रतिनिधि भेजता है।

कन्वेंशन के बारे में

  • यह प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था के लिए विशेष रूप से समर्पित प्रथम विधिक रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय श्रम मानक है।
    • यह एक वैश्विक रूपरेखा स्थापित करता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि तकनीकी नवाचार तथा नए व्यावसायिक मॉडल, श्रमिकों के अधिकारों, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा तथा सतत आर्थिक विकास के साथ समानांतर रूप से आगे बढ़ें।
  • यह कन्वेंशन डिजिटल श्रम प्लेटफ़ॉर्म तथा डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों पर लागू होता है, चाहे वे रोजगार संबंध में हों अथवा नहीं, जिसमें स्व-नियोजित श्रमिक भी शामिल हैं।
  • इसके अंतर्गत स्थान-आधारित तथा ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म कार्य दोनों सम्मिलित हैं।
  • यह कन्वेंशन निम्नलिखित व्यापक विषयों को संबोधित करता है—
  • कार्यस्थल पर मौलिक सिद्धांत एवं अधिकार।
  • व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य।
  • हिंसा एवं उत्पीड़न।
  • गरिमापूर्ण रोजगार अवसरों का संवर्धन।
  • पारिश्रमिक अथवा भुगतान।
  • सामाजिक सुरक्षा।
  • एल्गोरिदम आधारित स्वचालित प्रणालियों का श्रमिकों पर प्रभाव।
  • डेटा संरक्षण एवं निजता।
  • कार्य का निलंबन, निष्क्रियकरण तथा सेवा-समाप्ति।
  • प्रवासियों एवं शरणार्थियों का संरक्षण।
  • न्याय तक पहुँच।
  • स्वचालित प्रणालियों के संबंध में: इस कन्वेंशन में एल्गोरिदम आधारित स्वचालित प्रणालियों, जिनमें स्वचालित निर्णय-निर्धारण प्रणालियाँ भी शामिल हैं, के श्रमिकों पर पड़ने वाले प्रभाव से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
  • यह ऐसे सिद्धांत स्थापित करता है जो इन प्रणालियों के पारदर्शी उपयोग तथा श्रमिकों को प्रभावित करने वाले स्वचालित निर्णयों के विरुद्ध समीक्षा तंत्र तक पहुँच सुनिश्चित करते हैं।
  • किसी देश द्वारा इस कन्वेंशन के अनुसमर्थन के पश्चात इसे उस देश की विधिक व्यवस्था एवं राष्ट्रीय प्रथाओं के अनुरूप राष्ट्रीय कानूनों, विनियमों, नीतियों तथा सामूहिक समझौतों के माध्यम से लागू किया जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन

  • यह संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है, जिसकी स्थापना 1919 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के उपरांत वर्साय की संधि के अंतर्गत की गई थी।
  • वर्ष 1946 में यह संयुक्त राष्ट्र की प्रथम विशिष्ट एजेंसी बना।
  • भारत 1919 में, स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का संस्थापक सदस्य बना।
  • वर्तमान में इसके 187 सदस्य देश हैं।
  • यह श्रम मानकों का निर्धारण करता है, नीतियों का निर्माण करता है तथा सभी महिलाओं एवं पुरुषों के लिए गरिमापूर्ण कार्य को बढ़ावा देने हेतु कार्यक्रम संचालित करता है।
  • यह संयुक्त राष्ट्र की एकमात्र त्रिपक्षीय एजेंसी है, जो सरकारों, नियोक्ताओं तथा श्रमिकों को एक साझा मंच पर लाती है।
  • इसका मुख्यालय जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में स्थित है।

गिग श्रमिक कौन हैं?

  • गैर-मानक अथवा गिग कार्य से आशय ऐसी आय अर्जित करने वाली गतिविधियों से है, जो पारंपरिक एवं दीर्घकालिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों से बाहर होती हैं।
  • यह मुख्यतः स्वतंत्र ठेकेदारों एवं फ्रीलांसरों द्वारा किए जाने वाले अस्थायी तथा अंशकालिक कार्यों पर आधारित होता है, न कि पूर्णकालिक स्थायी कर्मचारियों पर।
  • “गिग” शब्द संगीत जगत से लिया गया है, जहाँ कलाकार विभिन्न स्थानों पर अल्पकालिक प्रस्तुतियों के लिए अनुबंध करते हैं।
  • गिग अर्थव्यवस्था में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से फ्रीलांसरों को ग्राहकों से जोड़कर अल्पकालिक सेवाएँ अथवा परिसंपत्ति-साझाकरण उपलब्ध कराया जाता है।
  • इसके प्रमुख उदाहरण हैं—
    • राइड-हेलिंग ऐप्स,
    • खाद्य वितरण ऐप्स,
    • अवकाश आवास किराया ऐप्स।

भारत एवं गिग अर्थव्यवस्था (नीति आयोग के अनुसार)

  • वर्ष 2020 में लगभग 77 लाख (7.7 मिलियन) श्रमिक गिग अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए थे।
  • वर्ष 2029-30 तक गिग कार्यबल के बढ़कर 2.35 करोड़ (23.5 मिलियन) अथवा देश के कुल कार्यबल का लगभग 4.1% होने का अनुमान है।
  • लगभग 39% गिग श्रमिक प्रतिमाह ₹10,000–₹25,000 तथा 34% श्रमिक ₹25,000–₹40,000 तक की आय अर्जित करते हैं। अधिकांश को 12 घंटे तक कार्य करना पड़ता है, ईंधन का व्यय स्वयं वहन करना पड़ता है तथा अतिरिक्त समय का कोई भुगतान नहीं मिलता।
  • केवल लगभग 15% गिग श्रमिकों को किसी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है।
  • वर्तमान में लगभग 47% गिग कार्य मध्यम कौशल, 22% उच्च कौशल तथा 31% निम्न कौशल वाले कार्यों में है।
  • भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 1.25% का अतिरिक्त योगदान दे सकता है तथा दीर्घकाल में 9 करोड़ (90 मिलियन) रोजगार सृजित करने की क्षमता रखता है।

गिग श्रमिकों की संख्या में वृद्धि के कारण

  • महामारी के पश्चात: वर्ष 2020 की कोविड-19 महामारी के दौरान यह प्रवृत्ति तीव्र हुई। इस अवधि में गिग श्रमिकों ने घरों में रह रहे उपभोक्ताओं तक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति की, जबकि जिन लोगों के रोजगार समाप्त हो गए थे, उन्होंने आय अर्जित करने के लिए अंशकालिक एवं अनुबंध आधारित कार्य अपनाया।
  • कहीं से भी कार्य करने की स्वतंत्रता: इस प्रकार के कार्य स्वतंत्र अनुबंध आधारित सेवाएँ प्रदान करने की सुविधा देते हैं तथा अधिकांश मामलों में फ्रीलांसरों को कार्यालय में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होती।
  • प्रौद्योगिकी एवं इंटरनेट का विकास: तीव्र गति वाले इंटरनेट तथा स्मार्टफ़ोन के व्यापक प्रसार ने किसी भी स्थान से कार्य करना अधिक सरल एवं सुविधाजनक बना दिया है।
  • लघु संगठनों के लिए सुविधाजनक: जो नियोक्ता सभी कार्यों के लिए पूर्णकालिक कर्मचारियों की नियुक्ति करने में सक्षम नहीं होते, वे व्यस्त अवधि अथवा विशिष्ट परियोजनाओं के लिए अंशकालिक या अस्थायी कर्मचारियों को नियुक्त करना अधिक उपयुक्त समझते हैं।
  • नियोक्ताओं के लिए लाभकारी: नियोक्ताओं को चिकित्सा बीमा, भविष्य निधि तथा वर्षांत बोनस जैसी कर्मचारी सुविधाएँ प्रदान करने की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए उनके लिए कार्य की इकाई के आधार पर भुगतान करना अधिक किफायती एवं लाभकारी विकल्प सिद्ध होता है।

चुनौतियाँ

  • कार्य–जीवन संतुलन: कुछ श्रमिकों के लिए गिग कार्य में उपलब्ध लचीलापन वास्तव में उनके कार्य–जीवन संतुलन, नींद के नियमित चक्र तथा दैनिक जीवन की गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
  • पूर्णकालिक कर्मचारियों का स्थान ले सकता है: फ्रीलांस श्रमिकों द्वारा कार्यभार संभाले जाने के कारण कंपनियों में पूर्णकालिक कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो सकती है।
  • नियमित रोजगार संबंधी लाभों का अभाव: अनेक नियोक्ता स्वास्थ्य बीमा, सवेतन अवकाश तथा अन्य कर्मचारी सुविधाएँ प्रदान करने से बचकर अपनी लागत में कमी करते हैं।
    • प्लेटफ़ॉर्म कंपनी और श्रमिक के बीच सामान्यतः औपचारिक रोजगार संबंध नहीं होता तथा अल्पकालिक अनुबंधों में प्रायः कर्मचारियों को नियमित सेवा लाभ प्राप्त नहीं होते।

गिग श्रमिकों के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: सरकार ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 का निर्माण किया है, जिसके अंतर्गत गिग श्रमिकों एवं प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों के लिए जीवन एवं दिव्यांगता सुरक्षा, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य एवं मातृत्व लाभ, वृद्धावस्था संरक्षण आदि से संबंधित उपयुक्त सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ तैयार करने का प्रावधान किया गया है।
    • इस संहिता के अनुसार एग्रीगेटर कंपनियों को अपने वार्षिक कारोबार का 1% से 2%, जो श्रमिकों को किए गए कुल भुगतान के अधिकतम 5% तक सीमित होगा, सामाजिक सुरक्षा कोष में जमा करना होगा।
    • हालांकि, इस संहिता के अंतर्गत किए गए ये प्रावधान अभी तक प्रभावी नहीं हुए हैं
  • ई-श्रम पोर्टल: सरकार ने वर्ष 2021 में ई-श्रम पोर्टल प्रारंभ किया, जिसका उद्देश्य गिग श्रमिकों एवं प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों सहित असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का पंजीकरण करना तथा उनका व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना है।
    • इस पोर्टल पर व्यक्ति स्व-घोषणा के आधार पर अपना पंजीकरण करा सकता है। इसमें लगभग 400 व्यवसायों को सम्मिलित किया गया है।

निष्कर्ष 

  • पारंपरिक पूर्णकालिक रोजगार में कार्यरत अधिकांश कर्मचारियों की भाँति गिग श्रमिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ प्राप्त नहीं होता, जिसके कारण वे चिकित्सा व्यय के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। कई बार यह व्यय अत्यधिक बोझिल तथा विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
  • चूँकि गिग श्रमिकों के पास प्रायः रोजगार की सुरक्षा तथा पूर्णकालिक रोजगार से जुड़े अन्य सामाजिक एवं आर्थिक लाभ उपलब्ध नहीं होते, इसलिए सरकार समर्थित सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था उनके लिए एक प्रभावी और आवश्यक सुरक्षा कवच सिद्ध हो सकती है।

स्रोत: TH

 

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